In between birth and death

Struggling to achieve unwanted goals, and walking to reach undecided destination

गुद-गुदी है बूंद-बूंदी May 8, 2009

Filed under: मेरी कविताए,Hindi — rammanohar @ 6:40 am

गुद-गुदी है बूंद-बूंदी !!!

धीरे धीरे हवा चली, मौसम सुहाना बन पड़ी
हवा संग नाचने, काली बादल निकल पड़ी
नदी चली तरंग में, संगीत उमंग की निकल पड़ी
हरी पतियों पर बूंद गिरी, मोतियों सी निखर पड़ी
हरी बालियों को बूंद चूमी, खेत-खलिआन झूम पड़ी
पंछीओ की चुच से, चु-चु निकल पड़ी
चुन्नी-मुन्नी कूदे आँगन में, कागजी-नाऊ निकल पड़ी
धुप संग रंग मिली, इन्द्रधनुष निकल पड़ी
हात पर बूंद लिया, मन को हुई गुद-गुदी

Ram Manohar, May 08, 2009

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सारी अकल सो गया है !! saari akal so gaya hai July 26, 2007

Filed under: मेरी कविताए,Hindi — rammanohar @ 8:50 pm

सारी अकल सो गया है 

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दिल है कि अब ऊब गया है,
सारी तमन्ना सुख गया है,
चाह्ता क्या है भूल गया है,
जिन्दगी कही खो गया है,
सारी अकल सो गया है

जिने कि अब ऊसुल कहा है,
गर्दिस मे कोइ धूल कहा है,
लाईफ मे कोइ अब जूनुन कहा है,
मन कि अब सकून कहा है,
हर हशी मे अब फूल कहा है

Ram Manohar

July 27, 2007

 

दबी जुबांन !! Dabe Juwan November 21, 2006

Filed under: मेरी कविताए,Hindi — rammanohar @ 8:47 pm

Few lines

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कल ही तो हम ने खुदखुसी की,
आज फिर से करना है,
पत्ता नहीं कबतक, हम अपना कत्त्ल करेंगे ।।
हे ऊपर बाले, रोज जिंदा करते क्यो हो ।।

जिंदा रहेंगे कैसे, जब हरेक दिन मरना पडं रहा है,
कोइ तो बतायें, जिन्दगी जिने की है या मरने की?

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जिसने कभी दोस्त की एहमियत को नही पेहचाना,
आज ऊसे दोस्तो की सहारा की जरूरत है।।

लोकल कल बहुत सस्ती हो गयी है,
एक कल करके हाल चाल पुछ सकती हो।।

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रोता हू तो अब आंसु नहीं आती
कितने निकले ये आंसु, कहीं कल की जरुरत तो नहीं?

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बूंद बूंद जमा, अब बांध बनके बैठा है,
जमिन ऊतना अब ऊंचा नंही, पैर का अब पत्ता नंही
अब तो हम बस तैरते है, नाओ के सहारे ।।

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दर्द दिलमे होती है ।
लेकिन दिमाग मेहसूस करता क्यो है?

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Basant Panchami , February 06, 2006

 

रुठ के तुम कहां जाओगी !! Rutha kay tum kaha jaaoge !!

Filed under: मेरी कविताए,Hindi — rammanohar @ 8:05 pm

रुठ के तुम कहां जाओगी,
लौट के तुम जरूर आओगी,

भूल हम से हुइ है क्या ऐसा,
जिसकी सजा इतनी बेरूखी जैसा,

सजा जब तुम हमको देती हो,
बन्द कमरे मे तुम क्यों रोती हो,

दर्द तो तुमको भि होती है,
जब जब तुम हमको सताती हो,

सुनहरे दिन जब निकाल जायेंगी,
तब पछ्ताये कुछ लौट नही आयेंगी

Aug 13, 2006

 

aashu ne saath chhod diya hai – आँसू ने साथ छोंड दिया है October 18, 2006

Filed under: मेरी कविताए,Hindi — rammanohar @ 9:51 pm

दर्द ने कसम खाँइ है, मगर हम भीं कोइ कम नहीं !
आसूँ कि नदिया निकालेंगे, मगर मुडेंगे पिछे हम नहीं !
बता देंगे उसको भी, जिने कि बहानें है कम नहीं !
पछाडेंगे दर्द को जरुर एक दिन, है जिंन्दगी के दिन कम नहीं !

कर लो ऐ दर्द जो भी अभी, बचीं नहीं आहट मुँह् कि अब कोइ !
आँसू ने साथ छोंड दिया है मेरा, तु क्या अब बिगाडेंगा अकेला !
ठहैर जाँ थोंडा, बदलने दे दिन थोंडा,
भाग जाएँगा तु भी, साथ नहीं निभा पाएँगा मेरा !

Ram Manohar

Oct 19, 2006

 

ek sannaata hai kahee !! एक सन्नाटा है कहीं August 14, 2006

Filed under: मेरी कविताए,Hindi,Poem — rammanohar @ 1:16 pm

दौड रहा है हर कोई,
मुकाम है न आगे कहीं,
एक सन्नाटा है कहीं !!

लडे झगडे है हर कोई,
रहगए लेकिन खाली मुठ्ठी,
एक सन्नाटा है कहीं !!

बोल रहा है हर कोई,
पहुच न पाईँ आवाज कहीं,
एक सन्नाटा है कहीं !!

देख रहा है हर कोई,
खुद को पहचाना कभी नहीं,
एक सन्नाटा है कहीं !!

सो रहीं है हर कोई,
बेचैन मन है और कहीं,
एक सन्नाटा है कहीं !!

पोथी पढे है हर कोई,
सुल्झा न पाईँ रहस्यमय गुथ्थीं,
एक सन्नाटा है कहीं !!

राम मनोहर
14 Aug 2006

 

rishte itane kamajor nahee hote !! रिश्ते इतने कमजोर नहीं होते August 10, 2006

Filed under: मेरी कविताए,Hindi,Poem — rammanohar @ 10:38 pm

रिश्ते इतने कमजोर नहीं होते
कच्चे धागे के डोर नहीं होते
कि, हलकी नोकझोंक मे टूट जाये !!

रिश्ते इतने कमजोर नहीं होते
सूखे पत्ते के छोर नहीं होते
कि, हलकी हवा से अलग हो जाये !!

रिश्ते इतने कमजोर नहीं होते
ताश के बने घर नहीं होते
कि, हलकी हलचल मे बिखर जाये !!

रिश्ते इतने कमजोर नहीं होते
रेत के बने महल नहीं होते
कि, हलकी बरिश मे बह जाये !!

राम मनोहर
15 July 2006